एक खिड़की बचपन की, बंद पड़ी थी, धुंधला सी गई थी,
न जाने कब से, इंतज़ार में ।
नन्ही परी सी, एक मासूम चेहरा, गुम सुम बैठी थी,
न जाने कब से, इंतज़ार में ।
खोल के खिड़की, झांक के अंदर, नज़र आया आंखो का समंदर,
न जाने कब से, इंतज़ार में ।
छोटी सी लड़की, कागज़ की एक नाव लिए, खेल रही थी,
न जाने कब से ,इंतज़ार में।
मिट्टी के वो छोटे से बरतन, चूल्हा, चिमटा, कढ़ाई, ढक्कन,
खेल रही थी अपने संग ही, छोटे हाथों से चौका बरतन,
मन ही मन मुस्काती लड़की, बन रही थी, अपनी मां का दर्पण,
गुड्डा, गुड्डी, संभाल रही थी, कर रही थी खुद को अर्पण,
जाने क्यूं इस मोह जाल में …खो रही थी अपना बचपन ।
खेल खेल में, यूं बीत गया.. उस लड़की का बचपन,
सपने संजोती, मुस्कुराती, अल्हड़ लड़कपन,
जाने कब उम्र आई और हाथों में सजे मेंहदी, कंगन,
जिंदगी के मांगो पर… कर दिया उसने खुद को समर्पण,
रफ्तार के शोर में वो भूल गई सुनना अपने दिल की धड़कन ।
एक खिड़की बचपन की, आज भी वही कहानी दोहरा रही थी,
न जाने कब से, इंतज़ार में ।
समुंदर भी सूख गया था, कागज़ की नाव डूब गई थी।
न जाने कब से, इंतजार में ।
घर घर खेल खेल में, क्यों जाने वो कुछ थक सी गई थी,
न जाने कब से, इंतज़ार में ।
गुड्डा, गुड्डी, खेल के रिश्तों को शिद्दत से निभा रही थी,
न जाने कब से , इंतज़ार में ।
Even with my limited Hindi knowledge, I loved “Khel’’.
Too beautifully depicted.
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I appreciate that my friend read my attempt at Hindi. I too am not proficient in Hindi. Thank you Anuradha. Always with a kind word.
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