गूंज

गूंज

अऐ दिल, यूं तन्हा क्या ढूंढता फीरे शोर के सैलाबों में,
कुछ देर तो ठहर, सुन, खामोशी गूंज रहा है ईन पत्थर के दिबारो में ।

इबादत गूंज रहा है मजाॅर के गलियारों में, और नानक नाम गूंज रहा है गुरुद्वारों के चौबारो में।

पीपल् की छाँव तले गूंज रही है भक्ति ,
गिरजा के दीवारों पर गूंजती है शक्ति।

कभी आक्रोश के बूंद गूंजता है मज़हब के नकाबो में,
या फिर ईश्वर,अल्लाह गूंजता है मन मंदिर के दरगाहों में।

मनुष्य के अनंत मन में गूंज रहा है निःशब्द भाषा ,
हर पल वो भी ढूंढ रहा है अंतहीन कोई दृढ़ आशा ।

रात की टूटी हुई महफिल के बाद गूंजती है यूँ रौनक, जैसे कोई दिखा रहा है सितारों को एक चमकता ऐनक।

बिस्तर के सिलवटें गूंजती है इश्क की अनकही, अनसुनी, दास्तान।
इत्र की मदहोशी में गूंजती है पर्बत के फूलों की खामोश जुबान।

सुबह के उजाले में, घुलती है इन्द्रधनुष सी मुलाकातें,
गूंजती है आसपास, बिखरी हुई कई अनमोल सौगातें।

समंदर के तट पर गूंजती है टूटते हुए लहरों की बातें ,
और पतझर में गूंजती है सूखे हुए पत्तों की सुखी यादें ।

इंतजार में गूंजती है मुलाकात के मीठे ख्वाब,
अंधकार में गूंजती है पूर्ण चंद्र सा महताब ।

फिर भी बेखयाली मे यूं तन्हा क्या ढूंढ रहा हैं हर पल, उदास सा ये दिल ?

हर गूंज, गूंज गूंज कर कह रहा है, अपने धड़कनो में कर ले तू ईनको सामिल।

खामोशी से कर के दोस्ती सुनना कभी गूंज की ध्वनि,
गुंजन में छुपी हुई है कहानिया अनगिनत, कुछ सुनी, कुछ अनसुनी।

खोजती हूं

खोजती हूं।

पुरानी तस्वीरों में, किताबो के लकीरों में,

खतों के पीले पन्नों में, तुम्हे खोजती हूं।

वो अल्फाज जो तुम्हारे सीने में न धड़के ,
उन्हें स्याही में डुबोने की कारण खोजती हूं।

वो एहसास जो तुम्हारे सांसों से न महके,
उसे जगाए रखने की वजह खोजती हूं।

वो सपने जो हम कभी साथ देख न पाए,
उन सपनों में रात गुजर क्या खोजती हूं ?

चादर की सिलबटो में, जुल्फों की रेशों में,
शायद छुपा हो कोई पैगाम, मैं खोजती हूं।

वो डोली जो तुम्हारे दहलीज तक न पहुंचे,
उस डोली में बैठने का अंजाम खोजती हूं।

मै अपने खामोशी में, एक लाचार दिल की,
टूटने की झंकार खोजती हूं।

जो चार दीवारों में तुम मुझे न मिले ,
तो बेशर्म, बेहया, मैं तुम्हे खुले बाजार
खोजती हूं ।