सन्नाटा

मेरे प्रतिबिंब से मैने पूछा , एक कठिन सवाल,
किस सन्नाटे में खो दिए हैं उसने, मेरे उम्र के सारे साल।

सन्नाटे में कान लगाए सुनने थे मुझे कोई जवाब,
आखिर ये जिंदगी थी, या फिर कोई अर्थहीन सा ख्वाब।

सन्नाटा गूंज रहा था ,जैसे दिल की धड़कन,
सन्नाटे से कैसा है ये मेरे खामोश दिल का बंधन।

कोई नही सुन रहा था पर गूंज रहा था हर पल,
गरज रहा था ,बरस रहा था, जैसे बहता कोई बादल ।

सन्नाटा एक शोर की तरह दीवारों से जा टकराई,
निर्दई सन्नाटे से कोई कह दे, न बने वो मेरी परछाई ।

दस्तक देता है सन्नाटा किसी के चले जाने के बाद,
रह जाते है कुछ बिखरे सामान और उनकी अनगिनत याद।

सूखी पत्तियों ने क्या कभी सुनी है कोई फरियाद
झड़ जाते हैं वो सन्नाटे में, जैसे अनकही, अन्ब्यक्त, कोई बात ।

दिल टूट ने से सन्नाटा गूंजता है लहरों की तरह,
लौट आते है बार बार अश्कों में साहिल की तरह।

मौत के बाद सन्नाटा गूंजता है बनके एक बेबस चीख,
उस सन्नाटे में रह जाती है एक अंतहीन सीख ।

शब्दो से बोझल आंखों से मैंने की है एक फरमाइश,
निस्तब्ध हो जाऊं सन्नाटे में, इतनी सी है ख्वाइश ।

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